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टीवी के ‘राम’ आशीष शर्मा की फिल्म को भारत में नहीं मिला मंच, विदेशों में जीते अवॉर्ड्स, अब STAGE पर हुई रिलीज़
आशीष शर्मा और अर्चना टी. शर्मा की इंटरसेक्स कहानी पर बनी फिल्म, जिसे मुंबई से मेक्सिको तक फेस्टिवल्स में सराहा गया, अब STAGE पर भारतीय दर्शकों तक पहुंच रही है
नई दिल्ली राजस्थान की रेत में खेजड़ी का पेड़ किसी से कुछ नहीं मांगता। न पानी, न छांव, न सहारा। आंधियां झेलता है, सूखा सहता है और फिर भी हरा रहता है। अभिनेता आशीष शर्मा और उनकी पत्नी अर्चना टी. शर्मा की फिल्म ‘खेजड़ी’ की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक ऐसी फिल्म, जिसे भारत में रिलीज़ करने वाला कोई नहीं मिला, लेकिन जिसने दुनिया भर के फिल्म फेस्टिवल्स में तालियां बटोरीं। और अब, बरसों के इंतज़ार के बाद, यह फिल्म भारत के तेजी से उभरता हुआ ओटीटी प्लेटफॉर्म STAGE पर उन्हीं घरों तक पहुंच रही है, जिस मिट्टी से इसकी कहानी निकली है।
पिता के दिए एक पन्ने से शुरू हुआ सफर
‘खेजड़ी’ की कहानी एक किताब से शुरू होती है। बरसों पहले आशीष के पिता ने उन्हें लेखक किरण सिंह की एक लघु कथा ‘सांझा’ पढ़ने को दी थी। आशीष उसे पढ़कर भूल गए, लेकिन कहानी उन्हें नहीं भूली। सालों बाद जब वो अपनी पहली फिल्म के लिए कहानी तलाश रहे थे, तो वही पन्ने फिर सामने आ गए।
छह साल तक यह कहानी उनके ज़ेहन में घूमती रही। फिर दो साल लगे इसे स्क्रीनप्ले में ढालने में। आशीष कहते हैं कि उन्होंने LGBTQ समुदाय पर जितनी कहानियां देखी थीं, सब में नज़रिया ‘हमारा’ होता था, कि हम उन्हें कैसे देखते हैं। ‘सांझा’ पहली ऐसी कहानी थी, जो उनकी अपनी नज़र से कही गई थी।
“उसका कसूर क्या था?”
अर्चना टी. शर्मा के मन में कहानी पढ़ने के बाद एक ही सवाल अटका रह गया। उस किरदार की गलती क्या थी? हम ये क्यों भूल गए कि हम सब इंसान हैं? यही सवाल फिल्म की आत्मा बना। ‘खेजड़ी’ आशीष और अर्चना की पहली प्रोडक्शन थी। दोनों ने मिलकर इसे लिखा और प्रोड्यूस किया, जबकि निर्देशन की कमान रोहित द्विवेदी ने संभाली।
फिल्म राजस्थान के एक गांव की उस बच्ची की कहानी है, जो इंटरसेक्स पैदा होती है और जिसे दुनिया की नज़रों से बचाने के लिए चारदीवारी में कैद कर दिया जाता है। दीवार के एक छोटे से छेद से वो दुनिया को देखती है और उसी से खुद को समझने की कोशिश करती है। अर्चना साफ कहती हैं कि उन्होंने इस कहानी को जानबूझकर नरम नहीं किया, क्योंकि वो पर्दे पर समाज की वही सच्चाई दिखाना चाहती थीं, जैसी वो है।
जब ‘राम’ ने खुद को मिटा दिया
टीवी की दुनिया ने आशीष शर्मा को ‘चंद्रगुप्त मौर्य’ में देखा, ‘रंगरसिया’ में चाहा और ‘सिया के राम’ में भगवान राम के रूप में पूजा। करोड़ों दिलों पर राज करने वाले इस अभिनेता के पास आसान रास्तों की कमी नहीं थी। फिर भी उन्होंने वो किरदार चुना, जिसे निभाने की हिम्मत बहुत कम सितारे जुटा पाते।
आशीष के मुताबिक, ‘खेजड़ी’ बनना कुछ सीखने से ज़्यादा, सब कुछ भुलाने का सफर था। उन्हें अपने भीतर का सब कुछ मिटाना पड़ा। शूटिंग के दौरान उन्होंने ट्रांस समुदाय की असल ज़िंदगी, उनके साथ होने वाले भेदभाव और उनसे जुड़े मिथकों को बेहद करीब से देखा। यही ईमानदारी आज फिल्म के हर फ्रेम में धड़कती है।
STAGE के को-फाउंडर एवं चीफ कंटेंट ऑफिसर प्रवीण सिंघल ने कहा, “खेजड़ी’ हिम्मत की कहानी है, पर्दे पर भी और पर्दे के पीछे भी। जिस फिल्म को दुनिया ने सलाम किया, उसे अपने ही देश में घर नहीं मिला था। आशीष और अर्चना ने जो कहानी पूरी ईमानदारी से कही, उसे राजस्थान के हर घर तक पहुंचाना STAGE के लिए गर्व की बात है।”
खड़े होकर तालियां: मुंबई से कोलोन, न्यूयॉर्क से मेक्सिको तक
दुनिया ने इस ईमानदारी को पहचानने में देर नहीं की। 2018 में मुंबई के KASHISH इंटरनेशनल क्वीयर फिल्म फेस्टिवल में फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर हुआ, जहां यह इंडियन पैनोरमा की ओपनिंग फिल्म बनी। स्क्रीनिंग खत्म होते ही दर्शक अपनी सीटों से खड़े होकर देर तक तालियां बजाते रहे।
इसके बाद जर्मनी के कोलोन में होमोक्रोम फिल्मफेस्ट ने ‘खेजड़ी’ को अपनी ओपनिंग फिल्म चुना। झारखंड इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और 2019 में न्यूयॉर्क साउथ एशियन फिल्म फेस्टिवल में आशीष को बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिला। उसी साल मेक्सिको के इंटरनेशनल क्वीयर फिल्म फेस्टिवल प्लाया डेल कारमेन में ‘खेजड़ी’ को बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म चुना गया।
और इस साल, अपनी ही मिट्टी पर, राजस्थान फिल्म फेस्टिवल में फिल्म ने बेस्ट एक्टर और बेस्ट सिनेमैटोग्राफर के अवॉर्ड जीतकर साबित कर दिया कि सच्ची कहानी का असर वक्त के साथ फीका नहीं पड़ता।
सम्मान मिला, पर दर्शक नहीं
इतने सम्मान के बावजूद ‘खेजड़ी’ के सामने सबसे बड़ा सवाल वही रहा, जो हर साहसी फिल्म के सामने होता है। भारत में इसे दर्शकों तक कौन ले जाएगा? सालों तक फिल्म को कोई प्लेटफॉर्म नहीं मिला। जो कहानी जर्मनी और अमेरिका में सराही गई, वो अपने ही देश, अपने ही राजस्थान के दर्शकों से दूर रही।
STAGE पर मिला अपना घर
यह इंतज़ार STAGE पर आकर खत्म हुआ। फेस्टिवल्स ने ‘खेजड़ी’ को सम्मान दिया, लेकिन STAGE ने उसे वो दर्शक दिया, जिसकी उसे बरसों से तलाश थी। अब यह फिल्म राजस्थान के उन घरों तक पहुंच रही है, जहां इसकी जड़ें हैं, उन लोगों तक जो इसकी बोली में सोचते हैं, सपने देखते हैं।
दिल्ली स्क्रीनिंग: तालियों से भारी पड़ी खामोशी
3 सितंबर को STAGE ने नई दिल्ली के BMVK ऑडिटोरियम में ‘खेजड़ी’ की विशेष स्क्रीनिंग आयोजित की। फिल्म खत्म हुई तो हॉल में कुछ पल खामोशी छाई रही, फिर तालियां गूंजीं।
‘मसान’ फेम अभिनेता विनीत कुमार ने स्क्रीनिंग के बाद कहा कि अगर फिल्म देखकर शर्मिंदगी महसूस हो, तो समझिए फिल्म अपना काम कर गई, क्योंकि सवाल समाज पर है।
बसेरा सामाजिक संस्थान की संस्थापक और ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता रामकली ने मंच से वो बात कही, जिसने सबको झकझोर दिया। उन्होंने कहा कि जहां लोगों को आशीर्वाद चाहिए, वहां हमें भगवान माना जाता है, लेकिन जब हम डिग्री और रिज़्यूमे लेकर नौकरी मांगने जाते हैं, तो दरवाज़े बंद मिलते हैं। उन्होंने समुदाय के कई सदस्यों को मंच पर बुलाया, जो तमाम मुश्किलों के बावजूद मुख्यधारा में अपनी जगह बना रहे हैं।
STAGE: जहां साहसी सिनेमा को मिलता है भरोसा
‘खेजड़ी’ को अपनाना STAGE की उस सोच का हिस्सा है, जिसमें मनोरंजन के साथ समाज के ज़रूरी सवालों को भी जगह मिलती है। जहां मुख्यधारा के प्लेटफॉर्म ऐसे विषयों से कतराते रहे, वहीं STAGE ने बोली में बनी इन कहानियों को पूरे भरोसे के साथ अपने दर्शकों तक पहुंचाया है।




