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देश की 9 सबसे डरावनी कहानियाँ, ‘टेरर टेल्स’ के साथ STAGE लाया है बंगाल की सबसे खतरनाक कहानियां
7 दिन में 12 लाख व्यूज़, जल्द सात और भाषाओं में आएगी एंथोलॉजी
कोलकाता: हॉरर कहानियों को पसंद करने वालों के लिए स्टेज अपने यूज़र्स को नौ कहानियां एक साथ देकर तोहफा दे रहा है। ये कहानियां ऐसी हैं, जिन्हें आप अकेले देखने की गलती भूल से मत करना। ‘टेरर टेल्स’ नाम की हॉरर एंथोलॉजी के जरिए लोगों को और डर देखने को मिलेगा। फिलहाल ये डरावनी कहानियां बंगाली भाषा में उपलब्ध है, मगर जल्द ही हिन्दी, पंजाबी, राजस्थानी, हरियाणवी, मराठी, गुजराती और भोजपुरी में उपलब्ध हो जाएगी।
7 दिन में 12 लाख व्यूज़
हॉरर एंथोलॉजी में आपको लोक कहानियां, कई आपबीती, कई सच्ची घटनाएं देखने को मिलेगी। सबसे दिलचस्प बात है कि इसमें कोलकता से लेकर धनबाद तक की मशहूर कहानियां मौजूद हैं। एंथोलॉजी की सभी नौ कहानियाँ जुनैद अलवी ने लिखी हैं। संवाद बंगाली की बोलचाल वाली ज़बान में हैं, जिसमें कोलकाता के शहरी लहजे से लेकर गाँव की ठेठ बोली तक की झलक मिलती है। बोली की यही ईमानदारी STAGE की पहचान रही है, और ‘टेरर टेल्स’ उसी सोच को हॉरर जॉनर तक ले जाती है।
कैसी है कहानी?
‘टेरर टेल्स’ का डर किसी दूर-दराज़ के खंडहर से नहीं निकलता। वह ट्यूशन की उस कोठरी में है, जहाँ टीचर की एक नज़र से बच्चे की साँस अटक जाती है। वह रात की उस बस में है, जिसमें बैठा एक आदमी अपने ही किए से भाग रहा है। वह उस डिलीवरी बॉय के घर में है, जो पत्नी को ख़ुश करने की हर कोशिश में थोड़ा और टूट जाता है।
एंथोलॉजी के किरदार परदे पर अजनबी नहीं लगते। वे पड़ोस के लगते हैं, परिवार के लगते हैं। और जब इन्हीं जाने-पहचाने चेहरों के साथ कुछ अनहोनी होती है, तो डर दर्शक के अपने घर तक चला आता है।
STAGE के को-फ़ाउंडर और चीफ कंटेंट ऑफिसर प्रवीण सिंघल ने कहा: “बंगाल में डर की कहानियाँ हमेशा एक सबक़ के साथ सुनाई जाती रही हैं। ‘टेरर टेल्स‘ उसी परंपरा को आज के दर्शक तक ले आती है, जहाँ हर कहानी डराती भी है और समाज को आईना भी दिखाती है। हमारा मानना है कि अपनी बोली में कही गई कहानी सबसे जल्दी दिल तक पहुँचती है, फिर चाहे वह प्रेम की हो या डर की।“
हर चीख़ के पीछे एक सामाजिक सच
‘टेरर टेल्स’ सिर्फ़ डराती नहीं, सवाल भी छोड़ जाती है। ‘कॉल ऑफ़ द नाइट’ में डर की जड़ सूखी फ़सल, गिरते दाम और क़र्ज़ में डूबे किसानों की बेबसी है। ‘वॉर इन द ब्लड’ दहेज प्रथा पर सीधा वार करती है। ‘वॉइड’ उन माँ-बाप के अकेलेपन की कहानी है, जिनके बच्चे बड़े शहरों में जाकर फ़ोन करना भी भूल जाते हैं। ‘इन्फ़्लुएंसर’ उस दौर पर उँगली रखती है, जब बच्चों के कानों तक सबसे पहले पहुँचने वाली आवाज़ माँ-बाप की नहीं रही। वहीं ‘द मेथड एक्टर’ चमक-दमक के पीछे बंद दरवाज़ों में होने वाले शोषण की बात करती है।
यानी हर कहानी का भूत, पिशाच या जिन्न दरअसल किसी न किसी सामाजिक ज़ख़्म की शक्ल है, जिसे हम रोज़ देखकर भी अनदेखा कर देते हैं।




