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एक पुराना अखबारी लेख, दो दशक का इंतज़ार और 45 फेस्टिवल्स का सफर: कोटा के दैदीप्य जोशी की ‘साँकल’ अब STAGE पर
2005 में पढ़े एक पत्रिका के लेख से शुरू हुई फिल्म ‘साँकल’ 45 अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स में चुनी गई, 15 से ज़्यादा पुरस्कार जीते और अब ओटीटी प्लेटफॉर्म STAGE के ज़रिए राजस्थान के दर्शकों तक पहुंच रही है
नई दिल्ली। कुछ कहानियां फिल्मकार चुनता है, और कुछ कहानियां फिल्मकार को चुन लेती हैं। कोटा के दैदीप्य जोशी के लिए ‘साँकल’ ऐसी ही कहानी थी। एक पत्रिका के पन्ने से शुरू हुई यह कहानी बरसों तक उनके भीतर पलती रही, दुनिया के 45 फिल्म फेस्टिवल्स तक पहुंची और 15 से ज़्यादा अवॉर्ड लेकर लौटी। आज वही ‘साँकल’ STAGE के ज़रिए उन लोगों तक पहुंच रही है, जिनके लिए वो बनी थी।
पत्रिका का वो पन्ना, जिसे बरसों संभालकर रखा
साल 2005 में दैदीप्य जोशी ने एक पत्रिका में राजस्थान की एक सामाजिक कुप्रथा पर लेख पढ़ा। लेख तो खत्म हो गया, लेकिन उसकी कहानी उनके मन से नहीं गई। उन्होंने वह पन्ना संभालकर रख लिया। सालों बाद वो जैसलमेर पहुंचे, लोगों से मिले और इस प्रथा का असर अपनी आंखों से देखा। तब तय हो गया कि यह कहानी पर्दे पर आएगी, चाहे जो हो।
कैमरे के पीछे दो दशक की तपस्या
दैदीप्य का सफर रातों-रात की कामयाबी की कहानी नहीं है। 1992 में उन्होंने असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में फिल्मी दुनिया में कदम रखा। इसके बाद टीवी सीरीज़ निर्देशित कीं, दर्जनों डॉक्यूमेंट्री बनाईं और सैकड़ों विज्ञापन फिल्मों पर काम किया। हर प्रोजेक्ट के साथ हुनर निखरता गया, और मन में ‘साँकल’ की कहानी दस्तक देती रही।
जब फिल्म बनाने का वक्त आया, तो रास्ता आसान नहीं था। दैदीप्य ने विज्ञापन फिल्मों से जुटाई अपनी बचत इस फिल्म में लगा दी। दोस्तों और साथियों ने हाथ थामा। उन्होंने फिल्म खुद लिखी, खुद निर्देशित की और खुद इसके निर्माता बने, क्योंकि यह कहानी इतनी निजी थी कि किसी और के भरोसे छोड़ी नहीं जा सकती थी।
दैदीप्य जोशी ने कहा, “यह फिल्म मेरे लिए सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं, बरसों पुराना वादा थी। अपनी बचत लगाई, दोस्तों ने हाथ थामा, तब जाकर ‘साँकल’ बन पाई। दुनिया भर में सम्मान मिला, लेकिन असली खुशी अब है, जब राजस्थान के लोग इसे अपनी बोली में देख रहे हैं।”
एक औरत, और उसकी हर सांस पर चढ़ी साँकल
‘साँकल’ एक ऐसी युवती की पीड़ा है, जिसे परंपरा के नाम पर अपनी उम्र से बहुत छोटे लड़कों से ब्याह दिया जाता है। उसकी ज़िंदगी पर एक नहीं, कई साँकलें चढ़ी हैं: परंपरा की, चुप्पी की और समाज की। अबीरा के किरदार में अभिनेत्री तनिमा भट्टाचार्य ने इस दर्द को इतनी शिद्दत से जिया कि दुनिया भर के फेस्टिवल्स में उनके अभिनय की सराहना हुई।
राजस्थान का दर्द, दुनिया की आवाज़
फिर जो हुआ, वो किसी सपने जैसा था। ‘साँकल’ का 45 अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स में चयन हुआ और फिल्म ने 15 से ज़्यादा अवॉर्ड अपने नाम किए। लखनऊ के शान-ए-अवध इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ने इसे बेस्ट फिल्म चुना और दैदीप्य को बेस्ट डायरेक्टर का सम्मान दिया। रशियन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में फिल्म ने बेस्ट फिल्म और बेस्ट एक्ट्रेस के अवॉर्ड जीते। अमेरिका के क्लीवलैंड से कनाडा के टोरंटो और बांग्लादेश के ढाका तक, दुनिया ने राजस्थान के इस दर्द को महसूस किया।
तालियों के बीच एक अधूरा सपना
लेकिन फेस्टिवल्स की तालियों के बीच भी हर फिल्मकार के मन में एक सवाल रहता है: क्या मेरी फिल्म उन लोगों तक पहुंचेगी, जिनकी कहानी वो कह रही है? क्षेत्रीय और ऑफ-बीट सिनेमा की यही सबसे बड़ी चुनौती रही है। अवॉर्ड मिल जाते हैं, सराहना मिल जाती है, लेकिन अपनी बोली का बड़ा दर्शक वर्ग नहीं मिल पाता।
STAGE के को-फाउंडर एवं चीफ कंटेंट ऑफिसर प्रवीण सिंघल ने कहा, “‘साँकल’ बताती है कि हमारी बोलियों में कितनी ताकतवर कहानियां छिपी हैं। जिस फिल्म को दुनिया के 45 फेस्टिवल्स ने सराहा, उसका असली हकदार राजस्थान का दर्शक है। STAGE पर हम यही पुल बना रहे हैं।”
STAGE पर पूरा हुआ सफर
यहीं STAGE ने वो पुल बनाया, जिसकी ‘साँकल’ को बरसों से तलाश थी। ओटीटी प्लेटफॉर्म STAGE ने इस फिल्म को वो घर दिया, जिसकी यह हकदार थी। आज ‘साँकल’ राजस्थान के उन्हीं गांवों, कस्बों और घरों तक पहुंच रही है, जहां से इसकी कहानी निकली थी। देश-विदेश में बसे राजस्थानी परिवार भी अब अपनी बोली में इस कहानी से जुड़ पा रहे हैं।
STAGE की सोच साफ है: अच्छी कहानी किसी भी बोली में हो, उसे उसके दर्शक तक पहुंचना ही चाहिए। हरियाणवी, राजस्थानी, भोजपुरी, मराठी, गुजराती, बंगाली, पंजाबी और हिंदी में कंटेंट लाने वाला STAGE आज उन फिल्मकारों की सबसे मज़बूत आवाज़ बन चुका है, जो मुख्यधारा से हटकर समाज के असली सवाल उठाते हैं।






